नाहन: नगर परिषद भले ही भाजपा शासित थी लेकिन, 3 साल दखल कांग्रेस दिग्गज पार्षदों का नजर आया....और नप अध्यक्षा कार्यकारी अधिकारी के खिलाफ धरने पर बैठ गई..
अक्स न्यूज लाइन नाहन 07 मई :
नगर परिषद के इतिहास में जब से चुनाव के जरिए पार्षद चुने जाने लगे,अध्यक्ष की ताजपोशी होने लगी। वतर्मान में भाजपा से शासित नगर परिषद की अध्यक्षा को अपने पार्षदों के साथ विकास कार्य न होने के मामले में कार्यकारी अधिकारी के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए धरना लगाया नारेबाजी की थी ऐसा पहली बार हुआ।
लेकिन इस कवायद का कोई नतीजा नही निकाला। कांग्रेस सरकार के 3 सालों में पूर्ण बहुमत वाली भाजपा शासित नगर परिषद कामकाज को लेकर बेबस नजर आई। उधर अपनी ही अध्यक्ष के खिलाफ भाजपा के कुछ पार्षदों ने कांग्रेस द्वारा डीसी को सौंपे अविश्वास प्रस्ताव पर हां में हां मिलाई लेकिन डेमेज कंट्रोल हो जाने से अध्यक्ष की कुर्सी बची ।
नगर परिषद भले ही भाजपा शासित थी लेकिन 3 साल से पुरा दखल कांग्रेस दिग्गज पार्षदों का ही नजर आया। यह सही है कि चुनकर आये इन सभी पार्षदों ने लोगों के निजी काम कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी ताकि वोट बैंक बना रहे।
लेकिन नगर परिषद क्षेत्र के ज्वलंत मुद्दों को निपटाने में नाकाम साबित हुए हैं। शहर में सालों से सफाई व्यवस्था बेपटरी हो चुकी है, गारबेज एक्ट की धज्जियाँ उड़ रही है। आवारा पशुओं,हमलावर कुत्तों, उत्पाती बंदरों ने हजारों लोगों का सड़क पर चलना और जीना मुहाल कर दिया है। रेहड़ी फड़ी लगने वालों से पैदा हुई समस्या ज्यों की त्यो बनी है, नगर परिषद आमदनी के नाम पर पर्ची काट कर काम चला रही है।
लेकिन चुनाव जीतने के बाद पार्षद कोई योजना नही बनाते, नप प्रशासन के एक्शन में आड़े आ जाते हैं। अवैध निर्माण, अतिक्रमण पर चुप्पी साधे हुए रहते हैं। ऐसे मामलों में केस कंपाउंड कराने, एनओसी दिलाने में पीछे नहीं रहते, ताकि वोट पक्की रहे।
नगर परिषद के पूर्व पार्षद के अनुसार पिछले 5 सालों में करीब 800 से ज्यादा सदन में विभिन्न मुद्दों और योजनाओं को लेकर प्रस्ताव पारित हुए। लचर कार्यप्रणाली के चलते 400 से ज्यादा प्रस्तावों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। यानी इन प्रस्तावों को इम्प्लीमेंट ही नही किया गया ।
आरोप तो यह भी लगे कि कुछ पार्षद भाजपा शासित नगर परिषद अध्यक्ष की आलोचना में पीछे नहीं रहे लेकिन सदन की बैठकें तक नही होने दी। पिछले कई कार्यकारी अधिकारियों पर दबाव भी रहा,ऐसे करीब आधा दर्जन सदन की तय बैठकें नही हो सकी । जनहित में पार्टी लाइन से ऊपर उठकर सदन चलाना सभी पार्षदों की नैतिक जिम्मेदारी बनती थी। लेकिन ऐसा नही हुआ।








