नाहन: नही लड़ी नगर निगम बनवाने की जंग, दशकों से पार्षद अपना रूतबा बढ़ाने और बचाने के लिए लड़ते रहे चुनाव....

नाहन: नही लड़ी नगर निगम बनवाने की जंग, दशकों से पार्षद अपना रूतबा बढ़ाने और बचाने के लिए लड़ते रहे चुनाव....

अक्स न्यूज लाइन नाहन 29 मार्च :  अरुण साथी

देश मे कलकत्ता के बाद दूसरी नगर पालिका का दर्जा प्राप्त वर्तमान में नगर परिषद नाहन को नगर निगम  बनाने का सपना दशकों से धूल चाट रहा है।

आरोप है कि आज तक जितने भी पार्षद दशकों से चुन कर आए उन सब ने अपना रुतबा बढ़ाने व बचाने के लिए चुनावी लड़ाई तो जी भार कर लड़ी है लेकिन परिषद को नगर निगम बनवाने की जंग सच्चे मन से आज तक नही लड़ी।

जानकारी के अनुसार कांग्रेस शासित नगर ने पूर्व में नगर निगम बनाने के लिए प्रस्ताव पारित कर के सरकार को भेजा था लेकिन वर्तमान में भाजपा शासित परिषद में जब सदन में इस बारे में प्रस्ताव आया तो पहले चरण में ही रिजेक्ट कर दिया गया। क्योंकि कुछ पार्षदों को यह प्रस्ताव रास नहीं आया था।

 नगर परिषद के सियासी आका ही नही चहाते कि परिषद का रुतबा बढ़े। क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो नगर निगम में आईएसएस अधिकारी बैठेगा तो इनकी दखलंदाजी बन्द हो जायेगी। ऐसे में मनमर्जी व वोट बैंक को खुश रखने के काम कैसे होंगे।

 कांग्रेस- भाजपा की सरकारों ने भी नगर निगम बनाने के लिए कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई, ऐसा नहीं है कि सुबे में नये नगर निगम नही बने । शिमला के बाद धर्मशाला, पालमपुर, सोलन व मंडी नगर परिषदें निगम बनाए गए।

आरोप है कि नाहन नगर परिषद को आज तक उसका रुतबा बढ़ा कर निगम करने की सुध यहां के वोट बटोरने वाले कांग्रेस- भाजपा के नेताओं और पार्षदों ने नही ली ।

 आज तक नगर परिषद में पहुंचने के लिए पार्षद चुनाव जीतने के लिए हर हथकंडा अपनाते आए हैं। ठेका टेंडर व वोट बैंक बचाने में अपना समय पूरा करते है। अपने चहेतों को लाभ पहुंचाने में भी पीछे नहीं रहे। लेकिन नगर निगम के एक होकर कभी आगे नहीं आए।

करीब दो दशकों पर गौर करें तो अपनी लचर कार्यप्रणाली की बदौलत, शहरी क्षेत्र के हजारों लोगों से सीधे जुड़ी इस संवैधानिक संस्था का आज इम्पेक्ट खत्म हो गया है। ऐसे में लोगों की मनमानियां सबके सामने है। नगर परिषद में जन सुनवाई नही होती। इन सबके पीछे  सियासी दबाव औऱ दखलंदाजी ही तो है। पिछले कई सालों से तो सियासी दबाव इतना है कि यहां तैनात हुए कार्यकारी अधिकारी भी व्यवस्था संभालने में बेबस नजर आए।

 कई घपले घोटाले भी उजगार हुए हैं। सरकार करोडों का बजट दे रही है, ग्रांट भी मिल रही है, फिर भी सड़कों और वार्डो की बदहाली कम नहीं हुई। उधर आलम यह है कि सालों से शहर में सफाई व्यवस्था पटरी से उतर चुकी है। सफाई होने के बाद भी लोग दिन भर खुले में कचरा फेंक रहे हैं। आवारा कुत्तों , उत्पाती बन्दरों व गोवंश से हुई विकराल समस्या के आगे नगर परिषद बेबस और नाकाम हो चुकी है।

अगर नगर निगम बनेगा तो यह भी तय है बजट और ग्रांट में इजाफा होगा, स्टाफ की कमी दूर होगी। [

 इस मामले में नगर परिषद के दिग्गज कांग्रेस पार्षद रहे योगेश गुप्ता ने बताया कि कई बार सदन में परिषद को नगर निगम बनाने के लिए प्रस्ताव पारित करके सरकार को भेजे गए लेकिन कुछ भी बना, नगर निगम बनने से कई बड़े फायदे मिल सकते थे, जैसे बजट औऱ ग्रांट में इजाफा होगा,कर्मचारियों की कमी दूर हो सकती है निगम के हिसाब से स्टाफ़ मिलता लेकिन आज सरकार ने कोइ कदम नहीं उठाया।
 
नगर निगम को लेकर भाजपा के पार्षद रहे विक्रम वर्मा ने बताया कि बीते कार्यकाल में भी परिषद को नगर निगम बनाने के प्रस्ताव पारित आया था लेकिन पार्षद ही एक मत नही थे ऐसे में यह प्रस्ताव रिजेक्ट हो गया। निसन्देह अगर निगम बने तो विकास का दायरा बढ़ेगा, क्षेत्र बढ़ेगा,बजट व ग्रांट ज्यादा मिलेगी, स्टाफ की कमी दूर होगी।