बंजार की अनसुनी पुकार, कब जागेगा प्रशासन, कब सुनेगी सरकार?

बंजार की अनसुनी पुकार, कब जागेगा प्रशासन, कब सुनेगी सरकार?

तीर्थन घाटी गुशेनी बंजार(परस राम भारती):- आज़ादी के बाद से लेकर आज तक सत्ता या शासन किसी भी राजनीतिक दल का रहा हो, लेकिन हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले का बंजार विधानसभा क्षेत्र, विशेषकर आंतरिक सराज, विकास की दौड़ में हमेशा पीछे छूटता रहा है। यह स्थिति अब केवल एक क्षेत्रीय शिकायत नहीं रही, बल्कि प्रशासनिक उपेक्षा और राजनीतिक उदासीनता का प्रतीक बन चुकी है।

यह सवाल सामाजिक कार्यकर्ता एवं सेवानिवृत्त पर्यटन अधिकारी हेम राज शर्मा पलाच घाटी बंजार, ने एक बार फिर पूरे तथ्यों और ठोस तर्कों के साथ उठाया है। उनका कहना है कि बीते दो दशकों से अधिक समय से सड़क, सुरंग, पुल, पर्यटन ढांचा, सुरक्षा और मूलभूत सुविधाओं से जुड़े दर्जनों प्रस्ताव सरकारों और विभागों के समक्ष रखे जाते रहे हैं। कई बार इन्हें ज्ञापनों, बैठकों और यहां तक कि जनहित याचिकाओं के माध्यम से भी उठाया गया, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी जस की तस बनी हुई है।

जलोड़ी दर्रे के नीचे प्रस्तावित यातायात सुरंग, जिसे आंतरिक सराज की जीवनरेखा माना जाता है, आज भी फाइलों में दबी हुई है। यह 20-30 वर्ष पुराना प्रस्ताव अब तक केवल “विचाराधीन” ही बना हुआ है। इसी तरह एनएच-305 को राष्ट्रीय राजमार्ग घोषित किए जाने से पहले सड़क को पूरी तरह चौड़ा करने का प्रस्ताव भी अधूरा पड़ा है, जिसका सीधा खामियाजा आम जनता, पर्यटन  कारोबारिओं और पर्यटकों को भुगतना पड़ रहा है।

पर्यटन की अपार संभावनाओं के बावजूद सरेउलसर झील, रघुपुर गढ़, बशलेउ दर्रा, तीर्थन घाटी और अन्य क्षेत्रों तक पहुंच मार्ग, सार्वजनिक शौचालय, पर्यटक सूचना केंद्र और वोल्वो स्टैंड जैसी बुनियादी सुविधाएं आज भी अधर में लटकी हुई हैं।
लारजी से जलोड़ी दर्रे तक शौचालयों का अभाव, गुशेनी, जीभी और बठाहड़ में सार्वजानिक शौचालय का न होना प्रशासन की प्राथमिकताओं पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

इन क्षेत्रों में सड़कों, पुलों की हालत और भी चिंताजनक बनी हुई है। एनएच-305 के जर्जर छोटे पुल, बंजार से गुशेनी बठाहड़ तक के पुल, जयपुर-पलाच,  बंजार बठाहड़, गुशेनी पेखड़ी, शर्ची आदि सड़कों के ब्लैक स्पॉट, अधूरी लिंक सड़कें, और बाढ़ में बहा औट पुल, और अन्य छोटे पुल ये सभी केवल विकास नहीं, बल्कि जन सुरक्षा से जुड़े गंभीर मुद्दे हैं। इसके बावजूद लोक निर्माण विभाग और प्रशासन की गंभीरता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

हेम राज शर्मा का कहना है कि कई गांवों के लोगों ने सड़क निर्माण के लिए अपनी उपजाऊ कृषि भूमि तक दान कर दी, लेकिन वर्षों बाद भी उन्हें उसका लाभ नहीं मिला। वहीं युवाओं के लिए सार्वजनिक पुस्तकालय और खेल मैदानों जैसी बुनियादी सुविधा आज तक उपलब्ध नहीं हो पाई, जिसके कारण नशे जैसी सामाजिक समस्याएं बढ़ रही हैं।

वहीं बंजार विधानसभा क्षेत्र में विश्व धरोहर ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क बनने के बाद यहां की करीब 14 ग्राम पंचायतों के हजारों लोग प्रभावित हुए। पार्क क्षेत्र से इनके हक़ अधिकार छीन लिए गए। सरकार की ओर से स्थानीय लोगों को स्वरोजगार देने के प्रयास नाकाफी साबित हुए है। जिस कारण यहां के बेरोजगार युवा युवा गोवा, कर्नाटक और मनाली जैसे क्षेत्रों में रोजगार की तलाश में पलायन कर रहे हैं।

सबसे अहम सवाल धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी जुड़ा है। अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव के दौरान देव परंपराओं के कारण सुरंगों का उपयोग नहीं किया जाता। ऐसे में आंतरिक और बाहरी सराज की जनता के लिए वैकल्पिक, सुरक्षित और सम्मानजनक मार्गों की व्यवस्था क्यों नहीं की जा रही है।

पूछता है बंजार-
क्या आंतरिक सराज के लोग केवल चुनाव के समय याद किए जाने के लिए हैं?
क्या विकास सिर्फ शहरी और सुलभ क्षेत्रों तक ही सीमित रहेगा?
क्या पहाड़ों में रहने वाली जनता की सुरक्षा, सम्मान और भविष्य की कोई कीमत नहीं?

अब समय आ गया है कि कुल्लू जिला प्रशासन, हिमाचल प्रदेश सरकार और क्षेत्र के जनप्रतिनिधि इन मुद्दों को केवल कागज़ों में नहीं, बल्कि धरातल पर प्राथमिकता के आधार पर हल करें।
यदि समय रहते ठोस निर्णय नहीं लिए गए, तो यह उपेक्षा आने वाले समय में एक बड़े सामाजिक और राजनीतिक असंतोष का कारण बन सकती है।

आंतरिक सराज भी विकास चाहता है, बराबरी चाहता है और सम्मान चाहता है। अब सवाल यह नहीं कि समस्या क्या है, सवाल यह है कि सरकार और जनप्रतिनिधि कब जागेंगे?