महाशिवरात्रि: भीतर के अंधकार से संवाद

महाशिवरात्रि: भीतर के अंधकार से संवाद

  महाशिवरात्रि केवल एक धार्मिक तिथि नहीं, बल्कि भारतीय चेतना का वह विराट क्षण है, जहाँ आस्था, दर्शन और आत्मबोध एक-दूसरे से संवाद करते हैं। फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की यह चतुर्दशी, शिव-तत्त्व के स्मरण और साधना का पर्व है—वह शिव, जो संहारक नहीं, बल्कि परिवर्तन और कल्याण के अधिष्ठाता हैं। भारतीय दर्शन में शिव को आदि और अनंत के प्रतीक के रूप में देखा गया है। वे न केवल सृष्टि के संहारक हैं, बल्कि नवसृजन के भी मूल स्रोत हैं। शिव का डमरु ब्रह्मांड की लय को उद्घोषित करता है, गंगा का अवतरण करुणा का प्रतीक है और भस्म-विभूषण यह संदेश देता है कि भौतिकता अंततः नश्वर है। महाशिवरात्रि की रात्रि जागरण और साधना की रात्रि है। यह आत्मसंयम, मौन और अंतर्मुखी यात्रा का अवसर प्रदान करती है।महाशिवरात्रि भारतीय समाज का ऐसा पर्व है, जो कर्मकांड से आगे जाकर आत्मचिंतन की मांग करता है। यह रात देवपूजन से अधिक, स्वयं से मुठभेड़ की रात्रि है। शिव यहाँ मूर्ति नहीं, बल्कि चेतना का प्रतीक हैं—स्थिर, मौन और सजग। शिव का दर्शन हमें एक असहज सत्य से परिचित कराता है—परिवर्तन के बिना सृजन संभव नहीं। जिस संहार को हम भय की दृष्टि से देखते हैं, वही शिव के हाथों कल्याण का माध्यम बनता है। आज के समय में, जब हम परिवर्तन से डरते हैं और जड़ता को सुविधा मान लेते हैं, शिव का स्मरण हमें आगे बढ़ने का साहस देता है। महाशिवरात्रि का जागरण केवल रात्रि जागने की परंपरा नहीं, बल्कि चेतना को जाग्रत रखने का अभ्यास है। यह पर्व प्रश्न पूछता है—क्या हम भीतर से जाग रहे हैं, या केवल बाहर की रोशनी में जी रहे हैं? आज जब समाज उपभोग, प्रतिस्पर्धा और प्रदर्शन की अति से गुजर रहा है, शिव का योगी रूप संयम और संतुलन का विकल्प प्रस्तुत करता है। उनका वैराग्य पलायन नहीं, बल्कि विवेक है। उनका मौन निष्क्रियता नहीं, बल्कि स्पष्ट दृष्टि है। महाशिवरात्रि हमें यह भी स्मरण कराती है कि धर्म का अर्थ शोर नहीं, बल्कि आत्मसंयम है; और भक्ति का अर्थ केवल आस्था नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व है। शिव का नटराज रूप संकेत देता है कि जीवन का नृत्य तभी सुंदर है, जब लय और मर्यादा साथ हों। इस महाशिवरात्रि, आवश्यकता है कि हम शिव को मंदिरों तक सीमित न रखें। यदि समाज को स्थिरता चाहिए, तो उसे शिव-तत्त्व अपनाना होगा—साहस, करुणा और विवेक का संतुलन। देशभर के शिवालयों में उमड़ती श्रद्धालुओं की भीड़ केवल परंपरा का निर्वाह नहीं करती, बल्कि सामूहिक चेतना की उस धारा को जीवित रखती है, जहाँ व्यक्ति स्वयं से प्रश्न करता है—मैं कौन हूँ? आज के समय में, जब समाज भौतिक प्रगति और मानसिक अशांति के द्वंद्व से गुजर रहा है, महाशिवरात्रि हमें संतुलन का पाठ पढ़ाती है। शिव का योगी स्वरूप हमें स्मरण कराता है कि शक्ति और शांति, वैराग्य और करुणा—इनका सहअस्तित्व ही जीवन की पूर्णता है। महाशिवरात्रि का संदेश केवल उपवास और अनुष्ठान तक सीमित नहीं है। यह अहंकार के विसर्जन, विकारों के त्याग और चेतना के उत्थान का पर्व है। शिव का “नटराज” रूप बताता है कि जीवन एक निरंतर नृत्य है—जहाँ प्रत्येक क्षण परिवर्तन का संकेत है। आज का भारत युवा है, तेज़ है और लगातार ऑनलाइन है। उपलब्धियों की दौड़ में भागता यह समाज तकनीक से जुड़ा है, पर स्वयं से कटता जा रहा है। ऐसे समय में महाशिवरात्रि केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि एक आवश्यक ठहराव का संकेत है। शिव का मौन आज के शोरगुल भरे डिजिटल संसार के लिए एक चुनौती है। नोटिफिकेशन, रील्स और एल्गोरिद्म के बीच घिरा युवा मन लगातार उत्तेजित है, पर स्थिर नहीं। महाशिवरात्रि का जागरण हमें याद दिलाता है कि जागना केवल आंखों का नहीं, चेतना का विषय है। आज का तनाव केवल व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक है—करियर की अनिश्चितता, तुलना की संस्कृति और असफलता का भय। शिव का योगी स्वरूप इस तनाव का उत्तर देता है। वे सिखाते हैं कि नियंत्रण सब कुछ पाने में नहीं, बल्कि अनावश्यक छोड़ने में है। तकनीक स्वयं में समस्या नहीं है, समस्या है उसका असंतुलित उपयोग। शिव का नटराज रूप बताता है कि गति आवश्यक है, पर लय के बिना गति विनाशकारी हो जाती है। यही बात आधुनिक जीवन पर भी लागू होती है। महाशिवरात्रि हमें यह सोचने का अवसर देती है कि क्या हम केवल कनेक्टेड हैं, या सचमुच सचेत भी हैं। यदि युवा पीढ़ी को दिशा चाहिए, तो उसे शिव-तत्त्व अपनाना होगा—स्थिरता, साहस और आत्मसंयम। क्योंकि भविष्य केवल तेज़ दिमागों से नहीं, बल्कि शांत मनों से बनेगा।अतः महाशिवरात्रि हमें बाहरी अंधकार से अधिक, अपने भीतर के अज्ञान को दूर करने का आह्वान करती है। यही इस पर्व की सार्वकालिक प्रासंगिकता है—एक ऐसा उत्सव, जो मनुष्य को ईश्वर से नहीं, बल्कि स्वयं से जोड़ता है।विश्वविद्यालयों के गलियारों में आज सबसे आम शब्द हैं—डेडलाइन, प्लेसमेंट, प्रतियोगिता और भविष्य। युवा ऊर्जा से भरा है, पर मन अक्सर अस्थिर है। ऐसे समय में महाशिवरात्रि किसी कर्मकांड से अधिक, ठहरने और सोचने का अवसर देती है। शिव का योगी स्वरूप युवाओं को एक ज़रूरी संदेश देता है—हर समय भागते रहना ही प्रगति नहीं है। पढ़ाई, करियर और सोशल लाइफ के दबाव के बीच स्वयं से जुड़ने का समय निकालना भी उतना ही आवश्यक है। शिव का मौन हमें सिखाता है कि शांति कमजोरी नहीं, बल्कि आंतरिक शक्ति है। आज का युवा खुद को लगातार दूसरों से तुलना करता है—अंकों, पैकेज और सोशल मीडिया की चमक से। शिव का वैराग्य बताता है कि मूल्यांकन बाहर से नहीं, भीतर से होना चाहिए। सफलता वही सार्थक है, जो मानसिक संतुलन के साथ आए। तकनीक ने अवसर दिए हैं, पर उसने बेचैनी भी बढ़ाई है। महाशिवरात्रि का जागरण संकेत देता है कि जागरूकता केवल स्क्रीन पर सक्रिय रहने से नहीं, बल्कि विचारशील रहने से आती है। युवाओं के लिए शिव-तत्त्व कोई पुरानी बात नहीं, बल्कि आज की ज़रूरत है—साहस के साथ संयम, गति के साथ संतुलन और सपनों के साथ स्थिरता। क्योंकि सशक्त भविष्य की नींव शांत और सजग युवाओं से ही रखी जाएगी।