अक्स न्यूज लाइन मनाली, 12 मार्च :
हिमाचल प्रदेश आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं तैयारी परियोजना के अंतर्गत ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (ग्लोफ) जोखिम न्यूनीकरण एवं तैयारी विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन अटल बिहारी वाजपेयी पर्वतारोहण एवं संबद्ध खेल संस्थान मनाली में हिमाचल प्रदेश राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के सहयोग से किया गया।
कार्यशाला के मुख्य अतिथि अतिरिक्त सचिव (राजस्व) एवं कार्यक्रम निदेशक, हिमाचल प्रदेश राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण निशांत ठाकुर ने हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और टूटने से बन रही ग्लेशियल झीलों पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि इन झीलों की वैज्ञानिक निगरानी, अर्ली वार्निंग सिस्टम तथा विभागों के बीच बेहतर समन्वय को मजबूत करने की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि ग्लोफ संवेदनशील क्षेत्रों में गांव और पंचायत स्तर पर छोटे-छोटे समूह गठित किए जाएं, ताकि आपदा की स्थिति में संभावित नुकसान को कम किया जा सके।
कार्यशाला में विशेषज्ञों ने ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड जोखिम, निगरानी प्रणाली तथा आपदा तैयारी से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी साझा की। इस दौरान अभियंता अनिल कुमार जसवाल, खजाना राम , अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक एसडीआरएफ मंडी, डॉ. भानु प्रताप (वैज्ञानिक-डी, एनसीपीआरडी), डॉ. एस.एस. रंधावा (सेवानिवृत्त प्रधान वैज्ञानिक अधिकारी,, डॉ. रितेश कुमार एसडीएमए तथा प्रशांत इंचार्ज-कम-डॉक्यूमेंटेशन कोऑर्डिनेटर सहित कई विशेषज्ञ उपस्थित रहे।
विशेषज्ञों ने बताया कि ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड वर्तमान समय में हिमालयी क्षेत्रों के लिए एक गंभीर प्राकृतिक खतरे के रूप में उभर रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे उनके आगे या ऊपर बड़ी-बड़ी झीलें बन रही हैं, जो भविष्य में खतरे का कारण बन सकती हैं।
केंद्रीय जल आयोग की रिपोर्ट के अनुसार हिमाचल प्रदेश में दस ऐसी ग्लेशियल झीलें हैं जिनका क्षेत्रफल 10 हेक्टेयर से अधिक है, जिनमें से चार झीलें अत्यंत संवेदनशील मानी गई हैं। यदि समय रहते इस समस्या का समाधान नहीं किया गया तो भविष्य में यह गंभीर खतरा बन सकता है। जब इन झीलों को रोकने वाला प्राकृतिक बांध (बर्फ, मोरेन या चट्टान) किसी कारण से टूट जाता है, तो झील का पानी अचानक तेज गति से नीचे की ओर बहता है और विनाशकारी बाढ़ उत्पन्न करता है, जिसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) कहा जाता है।
हाल के वर्षों में हिमालयी क्षेत्रों में ऐसी घटनाओं की संभावना बढ़ी है, क्योंकि ग्लेशियल झीलों की संख्या और आकार दोनों तेजी से बढ़ रहे हैं। भारत के हिमालयी राज्यों जैसे सिक्किम, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और लद्दाख में कई झीलें उच्च जोखिम वाली मानी गई हैं। उदाहरण के तौर पर वर्ष 2023 में सिक्किम की साउथ लोन्क झील के फटने से तीस्ता नदी में भीषण बाढ़ आई थी, जिससे भारी नुकसान हुआ था। बढ़ते खतरे को देखते हुए भारत सरकार और वैज्ञानिक संस्थान उपग्रहों की मदद से ग्लेशियल झीलों की निगरानी, जोखिम आकलन और पूर्व चेतावनी प्रणाली विकसित करने पर काम कर रहे हैं। इस प्रकार ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड आज हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन से जुड़ी एक महत्वपूर्ण पर्यावरणीय और आपदा प्रबंधन चुनौती बन गया है।